Tuesday, September 29, 2009

मुझसे हाल पूछकर वो अपना हाल छुपाते हैं
दर्द पीकर दिल पे जखम भी खाते जाते हैं
क्यों नहीं समझता मैं नादाँ वो क्या चाहते हैं
क्यों कर खुलकर नही कह पता ये आंसू क्यों हैं
छुपा कर वो क्या जतलाना चाहते मुझसे हैं
क्या अपनों से छुपाकर कोई दर्द रखता है
क्या अपना कहकर भी अपनों से यूँ करता है
हमदर्द हमराज कहकर कोई यूँ कैसे करता है
हम तो उनकी राहों फूलों के पत्ते चाहते हैं
रेशम हम कहते हैं इसलिए पलकों से सहलाते हैं
कह दे जरा वो हम से अपना दर्द एक नदी जैसे
सागर ने नदी को कभी आगोश से मना किया है
गंगा ने कभी किसी के पापों को नहीं लिया है
क्या मोती ने सीप का दर्द नहीं समझा है
दोस्ती दोस्तों से है मेरे यार क्या तुने नही जाना है
क्यों कहते फिरते हो दोस्त मुझे तुने आपना माना है

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