
Tuesday, April 20, 2010
कहाँ अब वो खूनों-अदब यार "पैसा"

कहाँ बचा वो भी पानी है,
बाला है,
जानवरों तक ही रह गयी है,
आराम से मजहब न पूछिए,
कोई पर इंसानियत नहीं,
अपने-अपने धर्म हैं भाई ,
इंसानियत को हताहत किया हो,
कीजिएगा यहाँ बिकते बदन हैं,
रात भर नहीं सोयी हैं,
रोई दिलों में इंसानियत है .
Wednesday, April 7, 2010
छदम मानवता वादी


दंडनायक क़ा रूप धरे कैसे मानवता वादी हैं ये जिनके लिए इंसानियत सिर्फ मौत
कोई बेटा कोई भाई कोई सुहाग कब तक ये भेंट लेगें लोगों की प्राण आहुतियाँ
प्रकृति के पुजारी बने ये कैसे नर-नराधम ईशवर की सबसे रचना क़ा अंत करने वाले
जो नहीं लहू पानी करते आकर वार सामने हो ते दो-दो हाथ वीर कहलाते न कायरता की मूरत
रक्त पिपासु नराधम ये अहम् के पुजारी हैं जो चाहते हैं देश क़ा भक्षण थामे हाथ देशद्रोही
कैसे ये जनमानस के सेवक कहला सकते हैं अधर्म अन्याय के रूप मानवता के पुजारी नहीं
नहीं भावना में ही मानवता खेलते रोज़ ये खून की होलियाँ दुष्ट दंडनायक रक्त-पिपासु
कर दें आर-पार की अब लड़ाई कर दें इन दुष्टों क़ा संहार नहो मानवता यूँही तारतार
टेर है है भारत के सपूतों दुश्मन देश के हों या भीतर-बहार चुन-चुन मरो ना हो अपमानित मानवता
चहुँ ओर बहे विकाश की गंगा न रोये कोई माँ-बहन और रहें सुहागन सभी माँ-बहने
दे जीवन दाता अब ये वरदान कर दे नेस्तो नाबूद इन खरपतवारों को
रहे मेरी माँ अब भरपूर जीते हुवे जवानों से रहे बच्चों और जवानों से
Saturday, April 3, 2010

उम्र औरबंदिशें
इक उम्र ऐसी है ,
जहाँ पर आकर हर पल
कटती है,
जुबान और झुक जाता है ,
शीश वक़्त को देखकर
सिमटती है,
जिदगी अपने लिहाफ में ही ,
क्योकर अपने ही बेगाने
हो जाते हैं,
रह जाते हैं ख़ुशी के निशाँ भी ,
एक भूल बनकर फिर
याद आता है,
"खुदा" तनहाइयों में ,
जख्म इतने गहरे
हो जाते हैं,
खुदा भी लगने लगता है,
बेगाना सा क्यों लगता है,
क्योंकर दुश्मन जमाना सा,
फिर क्यों नहीं गाये जाते ,
तराने ख़ुशी के फिर क्यों,
नहीं मचलाती मिटटी
की खुशबू,
क्यों कर नर्म घांस काँटों
सी लगती ,
एक साथी जो मन को थाम,
ले पास आकर चाहत
होती है ,
दुनिया की बंदिशें न
तोड़ पाए,
हम के वो हमें तोड़ देंगी
बस बंदिशें
.............."फतन"
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