Wednesday, April 7, 2010

छदम मानवता वादी




मानवता क़ा रूप ओढ़े खून की होलियाँ खेल खुद क़ा मसीहा कहलाते
दंडनायक क़ा रूप धरे कैसे मानवता वादी हैं ये जिनके लिए इंसानियत सिर्फ मौत
कोई बेटा कोई भाई कोई सुहाग कब तक ये भेंट लेगें लोगों की प्राण आहुतियाँ
प्रकृति के पुजारी बने ये कैसे नर-नराधम ईशवर की सबसे रचना क़ा अंत करने वाले
जो नहीं लहू पानी करते आकर वार सामने हो ते दो-दो हाथ वीर कहलाते न कायरता की मूरत
रक्त पिपासु नराधम ये अहम् के पुजारी हैं जो चाहते हैं देश क़ा भक्षण थामे हाथ देशद्रोही
कैसे ये जनमानस के सेवक कहला सकते हैं अधर्म अन्याय के रूप मानवता के पुजारी नहीं
नहीं भावना में ही मानवता खेलते रोज़ ये खून की होलियाँ दुष्ट दंडनायक रक्त-पिपासु
कर दें आर-पार की अब लड़ाई कर दें इन दुष्टों क़ा संहार नहो मानवता यूँही तारतार
टेर है है भारत के सपूतों दुश्मन देश के हों या भीतर-बहार चुन-चुन मरो ना हो अपमानित मानवता
चहुँ ओर बहे विकाश की गंगा न रोये कोई माँ-बहन और रहें सुहागन सभी माँ-बहने
दे जीवन दाता अब ये वरदान कर दे नेस्तो नाबूद इन खरपतवारों को
रहे मेरी माँ अब भरपूर जीते हुवे जवानों से रहे बच्चों और जवानों से

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