कहाँ अब वो खूनों-अदब यार "पैसा"

दोस्त मेरे रगों में अब लहू ,
कहाँ बचा वो भी पानी है,
अब हर बात में हमारे नहीं ,
मेरे-तेरे का

बोल

बाला है,
इंसानियत की बात कुछ ,
जानवरों तक ही रह गयी है,
काटते है वो इंसान को बड़े ,
आराम से मजहब न पूछिए,
कोई कहता ईशवर-अल्लाह ,
कोई पर इंसानियत नहीं,
कत्ले आम से कोई गुरेज नहीं,
अपने-अपने धर्म हैं भाई ,
कोई तो बताये कहाँ धर्म ने ,

इंसानियत को हताहत किया हो,
मज़हब के पन्ने पे दर्ज दिखा दे,
कोई खुदा का नेक बन्दा हो
,
अरे शर्मो हया की क्या बात ,
कीजिएगा यहाँ बिकते बदन हैं,
बूढी माँ को दवा कहाँ बीवी सिर दर्द में,
रात भर नहीं सोयी हैं,
रब का डर गया पैसों के खातिर ,
रोई दिलों में इंसानियत है .
. . . . . . . . . . "फतन"
सच का आईना .......बहुत सच लिखा है दोस्त
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