Tuesday, April 20, 2010

कहाँ अब वो खूनों-अदब यार "पैसा"







दोस्त मेरे रगों में अब लहू ,

कहाँ बचा वो भी पानी है,

अब हर बात में हमारे नहीं ,

मेरे-तेरे का

बोल

बाला है,

इंसानियत की बात कुछ ,

जानवरों तक ही रह गयी है,

काटते है वो इंसान को बड़े ,

आराम से मजहब न पूछिए,

कोई कहता ईशवर-अल्लाह ,

कोई पर इंसानियत नहीं,

कत्ले आम से कोई गुरेज नहीं,

अपने-अपने धर्म हैं भाई ,

कोई तो बताये कहाँ धर्म ने ,

इंसानियत को हताहत किया हो,

मज़हब के पन्ने पे दर्ज दिखा दे,

कोई खुदा का नेक बन्दा हो

,


अरे शर्मो हया की क्या बात ,

कीजिएगा यहाँ बिकते बदन हैं,

बूढी माँ को दवा कहाँ बीवी सिर दर्द में,

रात भर नहीं सोयी हैं,

रब का डर गया पैसों के खातिर ,

रोई दिलों में इंसानियत है .

. . . . . . . . . . "फतन"







1 comment:

  1. सच का आईना .......बहुत सच लिखा है दोस्त

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