Saturday, April 3, 2010


उम्र औरबंदिशें

इक उम्र ऐसी है ,


जहाँ पर आकर हर पल

कटती है,


जुबान और झुक जाता है ,


शीश वक़्त को देखकर


सिमटती है,


जिदगी अपने लिहाफ में ही ,


क्योकर अपने ही बेगाने


हो जाते हैं,


रह जाते हैं ख़ुशी के निशाँ भी ,


एक भूल बनकर फिर


याद आता है,


"खुदा" तनहाइयों में ,


जख्म इतने गहरे


हो जाते हैं,


खुदा भी लगने लगता है,


बेगाना सा क्यों लगता है,


क्योंकर दुश्मन जमाना सा,


फिर क्यों नहीं गाये जाते ,


तराने ख़ुशी के फिर क्यों,


नहीं मचलाती मिटटी


की खुशबू,


क्यों कर नर्म घांस काँटों


सी लगती ,


एक साथी जो मन को थाम,


ले पास आकर चाहत


होती है ,


दुनिया की बंदिशें


तोड़ पाए,


हम के वो हमें तोड़ देंगी


बस बंदिशें


.............."फतन"

1 comment:

  1. वाह......उम्र कि बंदिश का बहुत अच्छा वर्णन किया है

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