
उम्र औरबंदिशें
इक उम्र ऐसी है ,
जहाँ पर आकर हर पल
कटती है,
जुबान और झुक जाता है ,
शीश वक़्त को देखकर
सिमटती है,
जिदगी अपने लिहाफ में ही ,
क्योकर अपने ही बेगाने
हो जाते हैं,
रह जाते हैं ख़ुशी के निशाँ भी ,
एक भूल बनकर फिर
याद आता है,
"खुदा" तनहाइयों में ,
जख्म इतने गहरे
हो जाते हैं,
खुदा भी लगने लगता है,
बेगाना सा क्यों लगता है,
क्योंकर दुश्मन जमाना सा,
फिर क्यों नहीं गाये जाते ,
तराने ख़ुशी के फिर क्यों,
नहीं मचलाती मिटटी
की खुशबू,
क्यों कर नर्म घांस काँटों
सी लगती ,
एक साथी जो मन को थाम,
ले पास आकर चाहत
होती है ,
दुनिया की बंदिशें न
तोड़ पाए,
हम के वो हमें तोड़ देंगी
बस बंदिशें
.............."फतन"
वाह......उम्र कि बंदिश का बहुत अच्छा वर्णन किया है
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