Thursday, December 9, 2010

बेचैनी के हिंडोले पे बैठ कर गाता
अक्सर अपने दर्द को सहलाता
कभी आसुओं से चेहरे नहलाता
कभी प्रेम और विरह के तराने गाता
सब से छुपाता अपने दर्द को
हँसी को अपने चेहरे पर खूबलाता
सब कहते प्रेमी दीवाना पागल कहींका
दिल करता कभी उसे भूलपाता
कौन समझाए इस पागल दिल को
जो यार छोड़ जाये बीच मझधार में
वो भी कभी वापस नहीं मिल पाता
यादें तो बहती हवाएं कौन रोक पाता

Wednesday, June 16, 2010

मन की उलझन



दिल में दफ़न दुवाओं के मकबरे हैं ,

यार था प्यारा बहुत अब अकेले हैं,

दिल में था प्यार बहुत अब भी चुप हैं,

दो लफ्ज न कह सके अफ़सोस अब है,

अब भी दुवाएं बहते पानी जैसी हैं,

बहारों में फूलों की खुशबु अब भी हैं,

पंछी मचला बेताब उड़ने को अब भी है,

यार प्यार करता तो अब भी है,

इंतजार पे इंतजार उस मन में अब भी है,

डरता हो तू कहता प्यार अब भी है,

खोल दे मन की गांठे यार से बन्दे कहदे ,

मेरा दिल तेरे प्यार से सरोबर अब भी है.


"फतन"

Tuesday, April 20, 2010

कहाँ अब वो खूनों-अदब यार "पैसा"







दोस्त मेरे रगों में अब लहू ,

कहाँ बचा वो भी पानी है,

अब हर बात में हमारे नहीं ,

मेरे-तेरे का

बोल

बाला है,

इंसानियत की बात कुछ ,

जानवरों तक ही रह गयी है,

काटते है वो इंसान को बड़े ,

आराम से मजहब न पूछिए,

कोई कहता ईशवर-अल्लाह ,

कोई पर इंसानियत नहीं,

कत्ले आम से कोई गुरेज नहीं,

अपने-अपने धर्म हैं भाई ,

कोई तो बताये कहाँ धर्म ने ,

इंसानियत को हताहत किया हो,

मज़हब के पन्ने पे दर्ज दिखा दे,

कोई खुदा का नेक बन्दा हो

,


अरे शर्मो हया की क्या बात ,

कीजिएगा यहाँ बिकते बदन हैं,

बूढी माँ को दवा कहाँ बीवी सिर दर्द में,

रात भर नहीं सोयी हैं,

रब का डर गया पैसों के खातिर ,

रोई दिलों में इंसानियत है .

. . . . . . . . . . "फतन"







Wednesday, April 7, 2010

छदम मानवता वादी




मानवता क़ा रूप ओढ़े खून की होलियाँ खेल खुद क़ा मसीहा कहलाते
दंडनायक क़ा रूप धरे कैसे मानवता वादी हैं ये जिनके लिए इंसानियत सिर्फ मौत
कोई बेटा कोई भाई कोई सुहाग कब तक ये भेंट लेगें लोगों की प्राण आहुतियाँ
प्रकृति के पुजारी बने ये कैसे नर-नराधम ईशवर की सबसे रचना क़ा अंत करने वाले
जो नहीं लहू पानी करते आकर वार सामने हो ते दो-दो हाथ वीर कहलाते न कायरता की मूरत
रक्त पिपासु नराधम ये अहम् के पुजारी हैं जो चाहते हैं देश क़ा भक्षण थामे हाथ देशद्रोही
कैसे ये जनमानस के सेवक कहला सकते हैं अधर्म अन्याय के रूप मानवता के पुजारी नहीं
नहीं भावना में ही मानवता खेलते रोज़ ये खून की होलियाँ दुष्ट दंडनायक रक्त-पिपासु
कर दें आर-पार की अब लड़ाई कर दें इन दुष्टों क़ा संहार नहो मानवता यूँही तारतार
टेर है है भारत के सपूतों दुश्मन देश के हों या भीतर-बहार चुन-चुन मरो ना हो अपमानित मानवता
चहुँ ओर बहे विकाश की गंगा न रोये कोई माँ-बहन और रहें सुहागन सभी माँ-बहने
दे जीवन दाता अब ये वरदान कर दे नेस्तो नाबूद इन खरपतवारों को
रहे मेरी माँ अब भरपूर जीते हुवे जवानों से रहे बच्चों और जवानों से

Saturday, April 3, 2010


उम्र औरबंदिशें

इक उम्र ऐसी है ,


जहाँ पर आकर हर पल

कटती है,


जुबान और झुक जाता है ,


शीश वक़्त को देखकर


सिमटती है,


जिदगी अपने लिहाफ में ही ,


क्योकर अपने ही बेगाने


हो जाते हैं,


रह जाते हैं ख़ुशी के निशाँ भी ,


एक भूल बनकर फिर


याद आता है,


"खुदा" तनहाइयों में ,


जख्म इतने गहरे


हो जाते हैं,


खुदा भी लगने लगता है,


बेगाना सा क्यों लगता है,


क्योंकर दुश्मन जमाना सा,


फिर क्यों नहीं गाये जाते ,


तराने ख़ुशी के फिर क्यों,


नहीं मचलाती मिटटी


की खुशबू,


क्यों कर नर्म घांस काँटों


सी लगती ,


एक साथी जो मन को थाम,


ले पास आकर चाहत


होती है ,


दुनिया की बंदिशें न


तोड़ पाए,


हम के वो हमें तोड़ देंगी


बस बंदिशें


.............."फतन"

Sunday, March 28, 2010




पुनीत प्रयासों की मंजिलें हमेशा अजीब होती है ,

छुना होता है वो आसमा जिसकी जमीं नहीं होती है,

फिर भी पा जाते हैं कुछ लोग वो मंजिलें नामुमकिन होती हैं,

देख ख़ुशी उनके चेहरे पर वो ये जमाना उन्हें फ़रिश्ता कहता है,

होता है वो अदभुत सा चमत्कार जो एक इन्सान करता है,

अंतर मन की अदभुत यात्रा इन्सान अपने को खुदा कहता है,

मेरी अदभुत इच्छा तरक्की करे इन्सान का अविष्कार हो,

आत्मा-हाड़-मांस-रक्त का निर्माण हो इंसानों का अविष्कार हो,

गुजर गए युग पर युग अब तक रचनात्मकता अदभुत ही है,

राम-कृष्ण-बुद्ध-महावीर-मोहम्मद पैगम्बर-जीसस दिलों मैं ,

क्यों आज तक कायम हैं किसी को इसका गुमान हो शायद ?
चार उपलब्धियों की मदहोशी खतरनाक भागवान बनते हैं,

इंसान के जान लेने का काम करते को खुदा कहते हैं,

जो चीज दिलों में पेवस्त ईशवर की अदभुत अविष्कार हैं,

कोई न बना पाया सूरज-चाँद-सितारे-नभ के नयनाभिराम नज़ारे,

सब ईशवर उसकी माया अदभुत अनजान दिलों में समाया है.


Friday, March 12, 2010


Yaad nahi karsakte to yad aaya na karo
Jugnu ko qaid kar k muskaraya na karo,
Roshni ki khatir kisi ka dil jalaya na karo,

Sitam karna hai karo par itna na karo!
Yaad nahi karsakte to yad aaya na karo….

Wednesday, March 10, 2010

Plz read this message sent to


me by a friend Please DO NOT WASTE food

If you have a function/party at your home in India

and food gets wasted , don't hesitate to



CALL THIS PHONE NO. 1098


(only in India ) - child helpline.




They will come and collect the food.




Please circulate this message which can




help feed many children.




PLEASE, DON 'T BREAK THIS CHAIN .......................



MANAVTA HI SABSE BADA UTTAM DHARM HAI.......
YES
"Helping hands are better than Praying Lips"
God conveys Eve good for you.
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Tuesday, March 9, 2010

DIL KAHAN PUCHAKAR ISHQ KARTA HAI,

DIL KYA SOCH KAR KISI PE MARTA HAI,

DIL KO KOI KUN KAR PYARA LAGTA HAI,

DIL KO KUN KAR KOI NYARA LAGTA HAI,

CHAND ME WO ASK ITNA PYARA LAGTA HAI,

SUKUN CHIN JAYE PAR WO PYARA LAGTA HAI,

HAR TANAHI GUJARTI USSI KI ORE HAI,

DIN-RAAT HAR PAL ANKHON ME BASTA HAI,

EK PAL USKE BINA NA PYARA LAGTA HAI,

SARE JAHAN ME WO EK HAMARA LAGTA HAI,

SUDH-BUDH NA RAHE PAR WO RAHTA HAI,

BINA JEENA NAHIN MARNA DUBHAR LAGTA HAI.