Wednesday, June 16, 2010

मन की उलझन



दिल में दफ़न दुवाओं के मकबरे हैं ,

यार था प्यारा बहुत अब अकेले हैं,

दिल में था प्यार बहुत अब भी चुप हैं,

दो लफ्ज कह सके अफ़सोस अब है,

अब भी दुवाएं बहते पानी जैसी हैं,

बहारों में फूलों की खुशबु अब भी हैं,

पंछी मचला बेताब उड़ने को अब भी है,

यार प्यार करता तो अब भी है,

इंतजार पे इंतजार उस मन में अब भी है,

डरता हो तू कहता प्यार अब भी है,

खोल दे मन की गांठे यार से बन्दे कहदे ,

मेरा दिल तेरे प्यार से सरोबर अब भी है.


"फतन"

1 comment:

  1. दो लफ्ज न कह सके अफ़सोस अब है,

    अब भी दुवाएं बहते पानी जैसी हैं,
    bahut bahut accha likha hai.........aise hi likhte rahe

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