Tuesday, October 27, 2009

जीवन नैया चली जा रही है न कोई छोर न ठिकाना है ,
मंद हवाओं के संग बहे जा रहे हैं दोस्तों से साथ लिए हैं,
नर्म मखमली अहसास जिंदगी को सुकून दिए जा रहा है,
न कोई फिक्र है न कोई चिंताएँ हैं न कोई बहाने हैं,
है वो सब अपना जो साथ खुदा दिया तुने भी तेरा हाथ है,
कठनाइयों को पार करने दिए हैं खुदा अपने हाँथ सदा हैं,
तुझे न भूल पाऊं निसदिन ऐ खुदा बंदगी तेरी ही है,
न राज चाहिए न मुक्ति फ़क्त तेरी बंदगी में जीना है,
साधू जीवन हो साधुता की मित्रता हो तेरे बन्दों में है,
मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारे सब हों सदा मेरे सिख दी है,
दाता दानी बड़ा सब जगत का तू ही पालनहार भी है,
अद्भुत आनंद का दाता ज्ञान ध्यान का सागर भी है,
कृपा रखना राखी जो सब नीचन पर सदा राखी है,
न अंगुल मॉल सी गति मेरी न सुदामा सी दिव्या दृष्टि है,
न हनुमंता सी मित्रता न बाली सुग्रीव सा जीवन मेरा है,
न पांडू पुत्रों सा ज्ञान न मैं कोई चतुर सुजान हूँ मैं,
न किए रावन से तप न अहिल्या सम तेरा इंतजार है,
राख मन मेरे प्रभु सदा आपनी शरणा भवसागर है,
तेरा पर कर न कर दर तेरे सदा पड़ा ये अज्ञानी है,
मूढ़ मस्तक पड़ा तेरे चरना दया दान कीजिये ,

5 comments:

  1. बहुत अच्छा लेख है। ब्लाग जगत मैं स्वागतम्।

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  2. स्वागत और शुभकामनाये , अन्य ब्लॉगों को भी पढ़े और अपने सुन्दर विचारों से सराहें भी

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  3. ब्लॉग परिवार में स्वागत है!लिखते और पढ़ते रहिये...!अपने विचार रखिये..

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